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 Cgpsc important essay in Ram Van Gaman Tourist Circuit Cgpsc important essay- 




हेलो दोस्तो स्वागत है हमारे ब्लॉग राकेश सपोर्ट में दोस्तो आज के इस पोस्ट में मैं आपको Cgpsc यानी छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग के Main  exam के पेपर- 2 में पुछे जाने वाले इम्पोर्टेंट निबंध लेकर आया हूं। राम वन गमन पर निबंध लाया हूं अगर आपको और ढेर सारा निबंध चाहिए तो हमारे ब्लॉग पर विजिट करें हम आपको बहुत सारे निबंध provide करवायेंगे तो बिना Time west किए पोस्ट को शुरू करते हैं


निबंध - राम वन गमन पर्यटन परिपथ


भगवान श्रीराम के वनवास की स्मृतियों को सहेजनेतथा संस्कृति एवं पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राम वन गमन परिपथ परियोजना के माध्यम से सार्थक प्रयास किया जा रहा है। 138 करोड़ रूपए की राम वन गमन परिपथ परियोजना में उत्तर छत्तीसगढ़ के

कोरिया जिले से लेकर दक्षिण छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले तक भगवान राम के वनवास काल जुड़े स्थलों का संरक्षण एवं विकास व प्रथम चरण में चिन्हित 9 पर्यटन तीर्थों का तेजी से कायाकल्प कराया जा रहा है।

          छत्तीसगढ़ शासन की इस महात्वाकांक्षी योजना से भावी पीढ़ी को अपनी सनातन संस्कृति से परिचित होने के अवसर के साथ ही देश-विदेश के पर्यटकों को उच्च स्तर की सुविधाएं भी प्राप्त होगी। चंद्रवंशीय राजाओं के नाम से चंद्रपुरी कहलाने वाला ग्राम चंदखुरी माता कौशल्या की

जन्मस्थली और मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का ननिहाल है। राजधानी रायपुर से 27 कि.मी. की दूरी पर 126 तालाबों वाले इस गांव में जलसेन तालाब के बीच में भारत का एक मात्र माता कौशल्या का मंदिर पुत्र रामचंद्र को गोद में लिए

हुए माता का अद्भुत प्रतिमा है। कौशल्या मंदिर में वर्ष 2019 में भूमिपूजन कर परिपथ के निर्माण की शुरूआत व 07 अक्टूबर 2021 को तीन दिवसीय भव्य राष्ट्रीय आयोजन के साथ सौंदर्यीकरण एवं जीर्णोद्धार कार्यों का लोकार्पण किया गया है, पर्यटकों की वृद्धि हुई है राम वनगमन परिपथ निर्माण की सफलता का परिचायक है।

         छत्तीसगढ़ की संस्कृति एवं परम्परा में प्रभु श्री राम रचे-बसे हैं। जय सिया राम के उद्घोष के साथ यहाँ दिन की शुरूआत होती है। छत्तीसगढ़ वासियों के श्री राम केवल आस्था ही नहीं है बल्कि वे जीवन की एक अवस्था और आदर्श व्यवस्था भी है, । भारत से लेकर दुनिया के कई देशों में श्रीराम को भगवान के रूप में पूजा जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ की शस्य श्यामला भूमि, श्रीराम को

भांजे के रूप में पूजती है। छत्तीसगढ़ प्राचीन दक्षिण कोसल एक ऐसी पवित्र धरा है जो उत्तर और दक्षिण दोनों क्षेत्र को जोड़ती है। इसीलिए छत्तीसगढ़ को दक्षिणा पथ भी कहा जाता है।

             छत्तीसगढ़ की पावन धरा में रामायण काल की अनेकघटनाएं घटित हुई हैं जिसका प्रमाण यहां की लोक संस्कृति, लोक कला, दंत कथा और लोकोक्तियां है। कई शोध प्रकाशनों से पता चलता है कि प्रभु श्रीराम ने छत्तीसगढ़ में वनगमन के दौरान लगभग 75 स्थलों का भ्रमण किया। इनमें से 65 स्थल ऐसे है जहां सियाराम ने

लक्ष्मण जी के साथ रूककर कुछ समय व्यतीत किया था । 

       रघुकुल शिरोमणि श्रीराम की जन्मभूमि अयोध्या लेकिन छत्तीसगढ़ उनकी कर्मभूमि है। चौदह वर्ष के कठिन वनवास काल के दौरान अयोध्या से प्रयागराज, चित्रकूट सतना गमन करते हुए श्रीराम ने दक्षिण कोसल याने छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के भरतपुर पहुंचकर मवई नदी

पारकर दण्डकारण्य में प्रवेश किया । मवई नदी के तट पर बने प्राकृतिक गुफा मंदिर, सीतामढ़ी - हरचौका में पहुंचकर उन्होनें विश्राम किया। इस तरह रामचंद्र जी के वनवास काल का छत्तीसगढ़ में पहला पड़ाव भरतपुर के पास सीतामढ़ी - हरचौका को माना जाता है। नदी के किनारे इस स्थान पर गुफाओं में 17 कक्ष है जो सीता की रसोई के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहीं पर अत्री मुनि के आश्रम में

माता अनसुईया ने सीता जी को नारी धर्म का ज्ञान दिया था, इस वजह से इस क्षेत्र को सीतामढ़ी के नाम से जाना जाता है।

        कोरिया से लेकर सुकमा तक राम वनगमन मार्ग में अनेक साक्ष्य बिखरे पड़े हैं जिन्हें सहेजना छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक मूल्यों को ही सहेजना है। पूरे राम वन गमन मार्ग को पर्यटन परिपथ के अंतर्गत प्रथम चरण में। सीतामढ़ी - हरचौका ( कोरिया), रामगढ़ (सरगुजा), शिवरीनारायण (जांजगीर-चांपा), तुरतुरिया (बलौदाबाजार) भाठापारा, चंदखुरी ( रायपुर ), राजिम (गरियाबंद), सप्तऋषि आश्रम सिहावा (धमतरी), जगदलपुर और रामाराम (सुकमा) को विकसित किया जा

रहा है।


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           पौराणिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में रामगिरि पर्वत सरगुजा जिले का यही रामगिरि - रामगढ़ पर्वत स्थित | सीताबेंगरा - जोगीमारा गुफा की रंगशाला को विश्व की सबसे प्राचीन रंगशाला माना जाता है। मान्यता है कि वन गमन काल में रामचंद्र जी के साथ सीता जी ने यहां कुछ |समय व्यतीत किया था इसीलिए नाम सीताबेंगरा पड़ा ।

             जांजगीर-चांपा जिले में प्राकृतिक सौन्दर्य से परिपूर्ण शिवनाथ, जोंक और महानदी का त्रिवेणी संगम स्थल शिवरीनारायण है। इस विष्णुकांक्षी तीर्थ का संबंध शबरी और नारायण होने के कारण इसे शबरी नारायण या शिवरीनारायण कहा जाता है। ये मान्यता है कि इसी स्थान पर माता शबरी ने वात्सल्य वश बेर चखकर मीठे बेर रामचंद्र जी को खिलाए थे। यहां नर-नारायण और माता शबरी का मंदिर है जिसके पास एक ऐसा वट वृक्ष है जिसके पत्ते दोने के आकार के है ।

               बलौदाबाजार जिले में सघन वन क्षेत्र से घिरा बालमदेवी नदी तट पर बसा तुरतुरिया छोटा सा ग्राम है। | महर्षि वाल्मीकि का आश्रम और लव-कुश की जन्मस्थली है। यहां पर नदी का पानी प्राकृतिक चट्टानों से होकर तुरतुर की ध्वनि के साथ प्रवाहित इस का नाम तुरतुरिया पड़ा ।

                     अपने वनवास काल में सियाराम ने आरंग से नदी मार्ग से चम्पारण्य और फिर महानदी जल मार्ग से राजिम में प्रवेश किया । महानदी, सोदूर और पैरी नदी के संगम के कारण छत्तीसगढ़ का प्रयागराज माना जाने वाला राजिम प्राचीन समय में कमल क्षेत्र पद्मावतीपुरा था । वन गमन के

| समय रामचंद्र जी ने लोमश ऋषि आश्रम में कुछ समय व्यतीत किया था। यहां से सियाराम ने लक्ष्मण जी के साथ कुलेश्वर महादेव के दर्शन कर पंचकोशी की यात्रा की थी ।

          धमतरी से 65 कि.मी. की दूरी पर घने जंगलों और पहाड़ियों से घिरा हुआ पवित्र स्थल सिहावा है। छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी पौराणिक महानदी का ये उद्गम क्षेत्र है ।श्रृंगी ऋषि का आश्रम होने के कारण इसे सिहावा कहा जाता है। मान्यता है कि राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए सिहावा

से श्रृंगी ऋषि को पुत्रेष्ठि यज्ञ के लिए अयोध्या आमंत्रित किया था और उसी यज्ञ स्वरूप प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन को जन्म हुआ।

          वनगमन करते हुए प्रभु श्रीराम नारायणपाल से इन्द्रावती नदी मार्ग से दण्डकारण्य के प्रमुख केन्द्र जगदलपुर पहुंचे। यहां स्थित 5 कि.मी. लम्बा और 2 कि.मी. चौड़ा विशाल दलपत जलाशय किसी समुद्र का आभास देता है। राम वनगमन का बस्तर क्षेत्र में महत्वपूर्ण पड़ाव चित्रकोट को माना जाता है । इन्द्रावती से गिरते हुए जलप्रपात के प्राकृतिक सौन्दर्य के कारण सिया राम का य

रमणीय स्थान रहा है। मान्यता है कि इसी स्थान पर प्रभु श्री राम से मिलने हिमगिरी पर्वत से भगवान शिव-पार्वती आए थे।

                      दण्डकारण्य क्षेत्र में भ्रमण करते हुए श्री रामचन्द्र दक्षिणापथ जाते समय कोटम्बसर से आगे नदी मार्ग से सुकमा होकर ऐसे स्थान पहुंचे जो उनके नाम रामाराम नाम से ही जाना जाता है। इसी के पास पहाड़ी पर श्रीराम के पद चिन्ह होने की किवदन्ती है कि यहां पर श्री राम ने भू- देवी की पूजा की थी । प्रसिद्ध चिट्मिट्नि देवी का मंदिर

है। रामनवमी के दिन रामाराम में विशाल मेला लगता है । | छत्तीसगढ़ न केवल भगवान राम की कर्मस्थली है बल्कि उनके जीवन संघर्षो का भी साक्षी है। छत्तीसगढ़ सरकार की सोच है कि मूल्यविहीन विकास न तो मनुष्यों के लिए कल्याणकारी हो सकता है और न ही प्रकृति के लिए ।

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